लाल बहादुर शास्त्री: सादगी, जय जवान जय किसान और रहस्यमयी मृत्यु
परिचय
लाल बहादुर शास्त्री भारत के दूसरे प्रधानमंत्री थे। उनकी सादगी, ईमानदारी और दूरदृष्टि आज भी लोगों के लिए प्रेरणा है। उन्होंने एक छोटे कद के नेता होते हुए भी बड़े फैसले लिए और भारतीय राजनीति को नई दिशा दी।
जय जवान जय किसान का नारा
1965 में भारत पाक युद्ध और खाद्यान्न संकट के समय शास्त्री जी ने नारा दिया – जय जवान जय किसान। इस नारे ने पूरे देश को जोड़ा और सैनिकों तथा किसानों को राष्ट्रनिर्माण का मुख्य आधार बताया। जवान देश की सीमा पर सुरक्षा की गारंटी हैं और किसान खेतों में अन्न की आपूर्ति के संरक्षक।
नारे का असर
- सैनिकों का मनोबल बढ़ा और उन्होंने युद्ध में अदम्य साहस दिखाया।
- किसानों ने हरित क्रांति की नींव रखी और देश को खाद्यान्न आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ाया।
- जनता में एकता और आत्मविश्वास की भावना मजबूत हुई।
शास्त्री जी की सादगी और नेतृत्व
प्रधानमंत्री बनने के बाद भी उनका जीवन सामान्य नागरिक जैसा रहा। उन्होंने सत्ता को कभी निजी लाभ के लिए इस्तेमाल नहीं किया। वे परिवार और राजनीति दोनों में ईमानदारी और सरलता के प्रतीक थे।
ताशकंद समझौता और रहस्यमयी मृत्यु
भारत पाक युद्ध के बाद सोवियत संघ की मध्यस्थता से 10 जनवरी 1966 को ताशकंद समझौता हुआ। शांति वार्ता के सफल समापन के बाद, 11 जनवरी 1966 को शास्त्री जी की अचानक मृत्यु हो गई।
आधिकारिक बयान में कहा गया कि उन्हें दिल का दौरा पड़ा था। लेकिन परिस्थितियाँ संदिग्ध थीं और परिवार ने भी कई बार शक जताया। यह रहस्य आज तक पूरी तरह साफ नहीं हो पाया। शास्त्री जी की मृत्यु भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी अनसुलझी पहेली बनी हुई है।
आज की प्रासंगिकता
आज जब भारत को रक्षा और कृषि दोनों क्षेत्र में चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, तब जय जवान जय किसान का नारा उतना ही महत्वपूर्ण है। यह हमें याद दिलाता है कि सेना और किसान दोनों ही भारत की आत्मा हैं।
निष्कर्ष
लाल बहादुर शास्त्री का जीवन हमें सिखाता है कि सादगी और दृढ़ता से बड़े बदलाव लाए जा सकते हैं। उनका नारा जय जवान जय किसान आज भी उतना ही प्रासंगिक है और उनकी रहस्यमयी मृत्यु भारतीय इतिहास का ऐसा अध्याय है जो लोगों के मन में सवाल छोड़ जाता है।