January 30, 2026
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IPS पूरन कुमार: शिकायतों में उलझा अफसर या सिस्टम से टूटा इंसान

प्रकाशित: 12 अक्टूबर 2025 · लेखक: Desi Radar टीम

वाई पूरन कुमार का नाम दस साल से चर्चा में रहा है. कुछ लोग उन्हें ईमानदार अफसर कहते थे. कुछ कहते थे कि उन्हें बस शिकायत करना आता था काम नहीं. उनकी कहानी एक तरह से प्रशासनिक संघर्ष का समेकित पाठ है. इसमें जमीनी हक़ीकत, न्यायिक झटके, और संस्थागत चुप्पी तीनों शामिल हैं.

1. करियर की शुरुआत और पहचान

Y. Puran Kumar हरियाणा कैडर के 2001 बैच के IPS अधिकारी थे. तकनीकी पृष्ठभूमि से आने वाले उन्होंने बी.ई. और प्रबंधन का कोर्स किया था. शुरुआती वर्षों में वे प्रशिक्षण और पुलिस प्रशिक्षण केंद्र जैसे कार्यों में रहे. सहकर्मियों की नज़रों में वे नियमों के सख्त पालक थे. उनका मानना था कि प्रशासन नियम से चले तो काम बेहतर होगा.

2. बदलती पोस्टिंग और असंतोष

2015 के बाद उनके पोस्टिंग रिकॉर्ड में लगातार बदलाव नजर आए. कभी IGP, कभी प्रशिक्षण केंद्र, कभी टेलीकॉम का अतिरिक्त प्रभार. पूरन कुमार बार-बार यह कहते रहे कि उन्हें हाशिये पर भेजा जा रहा है. उनका आरोप था कि उन्हें non-cadre या निहितार्थ पदों पर तैनात किया गया जिनका अस्तित्व प्रभावहीन था. इसी असंतोष ने उनकी पेशेवर ऊर्जा को शिकायतों की तरफ मोड़ दिया.

3. शिकायतों का सिलसिला

समय के साथ उनकी फाइलें शिकायतों से भरती गईं. वे वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ representations, पैनल जांचों की चुनौती और अदालत तक गए. 2021 में उन्होंने पूर्व DGP के खिलाफ गंभीर आरोप लगाए. कई बार उन्होने कहा कि उन्हें अधिकारियों द्वारा अपमानित किया गया और उनके अधिकारियों ने उनके अधिकारों से वंचित रखा. प्रशासनिक नजरिये से इन शिकायतों ने उनका प्रोफाइल "difficult to handle" बना दिया.

4. आरक्षण की पहचान और उसका प्रभाव

पूरन कुमार दलित पृष्ठभूमि से आते थे. UPSC के जरिए मिलने वाला आरक्षण उन्हें सेवा में अवसर देता है. पर सेवा की दुनिया में वही पहचान कभी-कभी बोझ बन जाती है. सहकर्मियों की एक श्रेणी उनके प्रदर्शन को caste lens से देखती रही. इस टूटन का असर उनकी मनोस्थिति पर दिखा और वे बार-बार यह महसूस करने लगे कि उन्हें बराबर का दर्जा नहीं मिल रहा.

5. कोर्ट का 'infructuous' फैसला और उसका मतलब

जब उन्होंने न्याय की आखिरी उम्मीद के रूप में अदालत का दरवाजा खटखटाया, तो कोर्ट ने एक उनकी याचिका को infructuous कहा. इसका मतलब था कि मामला अब अप्रासंगिक हो गया. अदालत के इस निर्णय ने उनके लिए न्याय की उम्मीद उस क्षण ही कमजोर कर दी. जब न्यायिक प्रक्रिया भी सुनने को असमर्थ दिखे, तो किसी अधिकारी की हताशा गहरा जाती है.

6. काम बनाम शिकायत - प्राथमिकता का उलटफेर

उनका करियर इस मायने में असामान्य था कि कोई ठोस policing achievement सार्वजनिक रिकॉर्ड में नहीं दिखता. बदले में शिकायतों की एक लंबी सूची है. कई सहकर्मी कहते हैं कि उन्होंने operational काम से हटकर grievance litigation में ज़्यादा वक्त बिताया. पुलिसिंग टीमवर्क है पर उनका रवैया अक्सर टीम के अनुकूल नहीं रहा.

7. रहस्य और दस्तावेज

उनके करीबी बताते हैं कि वे बार-बार कहते थे "मेरे पास proof है". उनकी निजी फाइलों में कुछ confidential चिह्नित दस्तावेज मिले. SIT ने जांच में कुछ दस्तावेज जब्त किए जिन्हें departmental interest बताया गया. इन्हें सार्वजनिक नहीं किया गया. इस छिपी जानकारी ने अटकलों को जन्म दिया कि वे कुछ ऐसी सामग्री रखते थे जो वरिष्ठों के लिए असुविधाजनक हो सकती थी.

8. नौ पन्नों का अंतिम पत्र

7 अक्टूबर 2025 को उनके सरकारी आवास में उनकी मृत्यु हुई. उनके पास से नौ पन्नों का हाथ से लिखा पत्र मिला. इसमें 16 अधिकारियों के नाम और आरोप थे. उन्होंने जातिगत अपमान और बढ़ती प्रताड़ना का उल्लेख किया. उसी पत्र में एक IAS अधिकारी राजेश खुल्लर की तारीफ भी थी. यह पत्र दिखाता है कि उनके आखिरी दिनों में वे गहरे आघात से गुजर रहे थे.

"मुझे लगातार प्रताड़ित किया गया है. मैंने कई बार न्याय मांगा. अब सहन क्षमता समाप्त हो गई है." - नोट का भावानुवाद

9. IPS बिरादरी की प्रतिक्रिया

IPS समूह में सार्वजनिक रूप से ज्यादा समर्थन नहीं आया. कुछ रिटायर्ड अफसरों ने निजी तौर पर कहा कि मामला दुखद है पर उन्होंने system से टकराना गलत समय पर किया. संगठनात्मक स्तर पर चुप्पी रही. यह चुप्पी बताती है कि नौकरशाही में किस तरह का भय और करियर जोखिम काम करता है.

10. क्या वे केवल शिकायत करने वाले थे?

कई सहकर्मी यही कहते हैं. उनका रवैया ऐसे अधिकारी जैसा दिखा जो हर निर्णय में साजिश का पैटर्न ढूंढता था. आलोचना के छोटे संकेतों को अपमान मान लेना, टीमवर्क से दूरी और विवादों में फंसना उनकी पहचान बन गए. इस नरेटिव के मुताबिक उनकी समस्या यह थी कि वे काम करने की जगह शिकायतों में उलझे रहे.

11. पर सिस्टम भी बेदर्जा जिम्मेदार रहा

सिस्टम ने भी पर्याप्त हस्तक्षेप नहीं किया. किसी समय पर अगर counselling, mentoring और सही तैनाती की जाती तो स्थिति अलग हो सकती थी. बार-बार टालने से उनकी हताशा बढ़ी. विभाग ने कई बार उन्हें अलग पोस्टिंग दी पर मनोवैज्ञानिक सहायता या समुचित समन्वय का प्रयास नहीं दिखा.

12. आरक्षण और मेरिट का जंग

पूरन कुमार का केस दिखाता है कि आरक्षण अवसर देता है पर सेवा में कई बार वही पहचान संदेह और अलगाव का कारण बन जाती है. समाज और संस्थान तब तक आरक्षण को स्वीकार करते हैं जब तक कि चुनौतियों की चर्चा निजी न हो. लेकिन जब वही अधिकारी किसी विवाद में आता है तब उसके फैसले और काम दोनों पर शक हावी हो जाता है.

13. निष्कर्ष - कठोर परंतु संतुलित सिख

Y. Puran Kumar की कहानी किसी हीरो और किसी खलनायक की नहीं है. यह एक अफसर की वह यात्रा है जिसमें कार्य, शिकायत, पहचान और सिस्टम के बीच टकराव होता है. कभी वे गलत थे. कभी सिस्टम की चुप्पी और प्रशासनिक व्यवहार ने उन्हें और विफल किया. यह केस प्रशासन के लिए चेतावनी है कि शिकायतों और सेवा के बीच संतुलन बनाए रखना चाहिए. early intervention जरुरी है.

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