कोरोना के बाद लगा कि अब सड़कें थोड़ी चैन लेंगी। लेकिन सरकार ने आम आदमी को नया तोहफ़ा दिया - ई-रिक्शा। सुनने में यह इको-फ्रेंडली समाधान लगता है, लेकिन हकीकत में यह सड़कों की दूसरी महामारी साबित हो रहा है। आज हालत यह है कि गाड़ी चलाना हो या पैदल चलना - हर जगह तिर्री बीच में अटककर ट्रैफिक का नया संकट खड़ा कर देती है।
नियम किताबों में, सड़क पर अराजकता
नोएडा और गाज़ियाबाद जैसे शहरों में हर महीने हज़ारों चालान काटे जाते हैं और सैकड़ों ई-रिक्शा जब्त होते हैं। लेकिन enforcement इतनी कमजोर है कि वही वाहन कुछ दिनों बाद फिर सड़क पर लौट आते हैं। कानून मौजूद है, लेकिन लागू करने की राजनीतिक इच्छा-शक्ति गायब है। नतीजा - आम आदमी का रोज़ का सफ़र एक जंग बन गया है।
आग से खेलने का खेल
घरों और गोदामों में बनाए गए अवैध चार्जिंग पॉइंट किसी टाइम बम से कम नहीं। दिल्ली और यूपी में कई बार आग लगी, लोग मरे, लेकिन सुरक्षित चार्जिंग हब बनाने पर कोई ठोस कदम नहीं उठे। सरकार का रवैया वही - हादसे पर बयान, और फिर खामोशी।
सरकारी नीतियाँ: बयानबाज़ी और दिखावा
हर कुछ महीने में कोई नई योजना आती है - QR कोड, कलर-कोड, ज़ोनिंग। अखबारों में नेताओं की तस्वीरें और बयान छपते हैं। लेकिन सड़क पर हालत वही रहती है। जनता को सुरक्षा चाहिए, सरकार को सुर्ख़ियाँ। इस खेल में मरता कौन है? आम नागरिक।
ई-रिक्शा का नया उपयोग - नई समस्या
अब ई-रिक्शा सिर्फ सवारियाँ ढोने तक सीमित नहीं। छोटे कस्बों और शहरों में इनका इस्तेमाल हर जगह हो रहा है - सब्ज़ी और अनाज की ढुलाई, अवैध सामान ले जाने, शादी-बारात में DJ गाड़ी, कूड़ा और निर्माण सामग्री ढोने तक। यानी समाधान का साधन अब सबसे बड़ी समस्या बन गया है।
आम आदमी की सुरक्षा का मज़ाक
ड्राइवरों के पास लाइसेंस नहीं, कोई ट्रेनिंग नहीं, और नियमों की समझ तो बिलकुल नहीं। सड़क पर आम आदमी हर दिन खतरे में है। ट्रैफिक नियम किताबों में लिखे हैं, लेकिन सड़क पर कोई पालन नहीं। यह व्यवस्था आम नागरिक की जान से खेलने जैसा है।
Desi Radar की राय
- ई-रिक्शा का रजिस्ट्रेशन और लाइसेंस अनिवार्य हो।
- सुरक्षित और मानक चार्जिंग हब बनाए जाएँ।
- ड्राइवरों को बेसिक ट्रेनिंग और लाइसेंसिंग दी जाए।
- सख्त जोनिंग और डेडिकेटेड स्टैंड बनाए जाएँ।
- ओवरलोडिंग और अवैध उपयोग पर तुरंत कार्रवाई हो।
निष्कर्ष
ई-रिक्शा ने last-mile connectivity दी है, लेकिन जब वही सुविधा सड़कों की सबसे बड़ी समस्या बन जाए तो सरकार को सोचना चाहिए। बयानबाज़ी और फोटो खिंचवाने से सड़कें सुरक्षित नहीं होंगी। जब तक ठोस नीति और सख्त कार्रवाई नहीं होती, तब तक यह "दूसरी महामारी" हर रोज़ आम आदमी को लहूलुहान करती रहेगी।