दिवाली का त्योहार नजदीक आते ही हवा में एक अजीब सी सनसनी घुलने लगती है, जो उत्सव की खुशी से कहीं ज्यादा परेशानी और गुस्से की होती है। हर साल यही होता है —पटाखों की चमक-दमक के बीच कुछ संगठन और एनजीओ सक्रिय हो जाते हैं, जो पर्यावरण बचाओ के नाम पर त्योहारों की गतिविधियों पर सवाल उठाते हैं। "पटाखे मत फोड़ो, प्रदूषण बढ़ जाएगा," "हवा पहले ही खराब है, दीवाली पर और न बिगाड़ो," जैसे नारे सुनने को मिलते हैं, और फिर कोर्टों में याचिकाएं आ जाती हैं जो पूर्ण या आंशिक प्रतिबंध का रास्ता खोल देती हैं। पर सवाल यह है कि यह चक्र हर बार किन कारणों से उस दिशा में घूमता है और क्या इस पूरे विवाद के पीछे सिर्फ़ पर्यावरण का मुद्दा ही है।
दिवाली भारत का प्रमुख त्योहार है, जो घरों में रोशनी और सामूहिक आनंद का प्रतीक है। पर पिछले एक दशक से हम एक पैटर्न देखते आ रहे हैं। कुछ प्रतिष्ठित पर्यावरण संगठन दिवाली के पहले रिपोर्ट जारी करते हैं जिसमें पटाखों के प्रभाव को उजागर किया जाता है और फिर याचिकाओं के रूप में यह मामला न्यायालयों तक पहुंचता है। 2017 में कुछ शहरों में पटाखों की बिक्री पर पाबंदी देखी गई, 2018 में कुछ शर्तों के साथ छूट मिली, और फिर से अलग-अलग सालों में अदालतों ने कदम उठाये। इन फैसलों के पीछे सार्वजनिक स्वास्थ्य का औचित्य दिया जाता है। दूसरी ओर कई लोगों को लगता है कि सिर्फ त्योहारों पर केंद्रित होना ही निष्पक्ष नहीं है।