दीपिका पादुकोण पैसे के लिए कुछ भी कर सकती हैं
दीपिका पादुकोण अब सिर्फ अभिनेत्री नहीं रहीं। वह एक ब्रांड हैं जो हर बार अपने बयान और अपनी चुप्पी को मौके के हिसाब से बेचती हैं। कभी JNU में खड़ी होती हैं तो कभी अबू धाबी के विज्ञापन में सिर ढककर दिखती हैं। दोनों जगह फर्क सिर्फ इतना है कि वहां फायदा तय था।
JNU की रात और प्रचार की सुबह
2020 में जब JNU में विवाद हुआ था तब दीपिका वहां पहुंचीं। किसी ने कहा यह साहस था, किसी ने कहा यह पब्लिसिटी थी। दोनों बातों में सच्चाई थी। उस रात उनकी एक फोटो ने उन्हें “नारी की आवाज़” बना दिया और उनकी फिल्म की टिकटें भी बिकीं। यह भावनाओं का नहीं, प्रचार का खेल था।
अबू धाबी में हिजाब और सम्मान का सौदा
अब अबू धाबी के एक विज्ञापन में वही दीपिका सिर ढककर दिखीं। भारत में जब बिंदी और तिलक की बात होती है तो वो कहती हैं औरत को मजबूर नहीं किया जाना चाहिए। लेकिन विदेशी विज्ञापन में वही काम करती हैं और इसे संस्कृति का सम्मान बताया जाता है। फर्क बस इतना है कि यहां कॉन्ट्रैक्ट है और वहां विचार।
जहां फायदा है वहां राय भी है
दीपिका के बयान हमेशा उनके हित में होते हैं। जब किसी मुद्दे पर बोलना फायदेमंद लगे तो वह बोलती हैं। जब बोलने से नुकसान हो सकता है तो वह चुप रहती हैं। यही उनका पैटर्न है। एक्टिविज़्म अब भावना नहीं, एक ब्रांड रणनीति है।
बॉलीवुड की नई दिशा
आज के बॉलीवुड में सोच नहीं, सेलिंग होती है। यहां एक्टिंग से ज्यादा इमेज मायने रखती है। दीपिका जानती हैं कब नारीवाद दिखाना है और कब पारंपरिक बनना है। दोनों ही चीज़ों से उन्होंने फायदा उठाया और हर बार पब्लिसिटी पाई।
क्या दीपिका का हर कदम पैसों के लिए है
कई बार उन्होंने अपने विचारों के उलट काम किया, बस इसलिए कि कॉन्ट्रैक्ट था। वही दीपिका जो कहती हैं कि औरत को अपनी मरज़ी से जीना चाहिए, वही विदेशी ब्रांड के लिए सिर ढक लेती हैं। यह दोहरापन अब नई सामान्य बात बन गया है।
निष्कर्ष
दीपिका पादुकोण कोई अपराधी नहीं हैं, लेकिन वह उस सोच की प्रतिनिधि हैं जो कहती है कि विचार बाद में आते हैं, पैसा पहले। JNU हो या अबू धाबी, हर जगह उन्होंने वही किया जिससे उन्हें फायदा मिला। यह कहानी उस बॉलीवुड की है जहाँ ईमानदारी की कीमत तय है और राय किराए पर मिलती है।