February 3, 2026
दिवाली, प्रदूषण और परंपरा - Vinod की रिपोर्ट
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दिवाली, प्रदूषण और परंपरा>
Published: October 04, 2025 |

दिवाली का त्योहार नजदीक आते ही हवा में एक अजीब सी सनसनी घुलने लगती है, जो उत्सव की खुशी से कहीं ज्यादा परेशानी और गुस्से की होती है। हर साल यही होता है —पटाखों की चमक-दमक के बीच कुछ संगठन और एनजीओ सक्रिय हो जाते हैं, जो पर्यावरण बचाओ के नाम पर त्योहारों की गतिविधियों पर सवाल उठाते हैं। "पटाखे मत फोड़ो, प्रदूषण बढ़ जाएगा," "हवा पहले ही खराब है, दीवाली पर और न बिगाड़ो," जैसे नारे सुनने को मिलते हैं, और फिर कोर्टों में याचिकाएं आ जाती हैं जो पूर्ण या आंशिक प्रतिबंध का रास्ता खोल देती हैं। पर सवाल यह है कि यह चक्र हर बार किन कारणों से उस दिशा में घूमता है और क्या इस पूरे विवाद के पीछे सिर्फ़ पर्यावरण का मुद्दा ही है।

दिवाली भारत का प्रमुख त्योहार है, जो घरों में रोशनी और सामूहिक आनंद का प्रतीक है। पर पिछले एक दशक से हम एक पैटर्न देखते आ रहे हैं। कुछ प्रतिष्ठित पर्यावरण संगठन दिवाली के पहले रिपोर्ट जारी करते हैं जिसमें पटाखों के प्रभाव को उजागर किया जाता है और फिर याचिकाओं के रूप में यह मामला न्यायालयों तक पहुंचता है। 2017 में कुछ शहरों में पटाखों की बिक्री पर पाबंदी देखी गई, 2018 में कुछ शर्तों के साथ छूट मिली, और फिर से अलग-अलग सालों में अदालतों ने कदम उठाये। इन फैसलों के पीछे सार्वजनिक स्वास्थ्य का औचित्य दिया जाता है। दूसरी ओर कई लोगों को लगता है कि सिर्फ त्योहारों पर केंद्रित होना ही निष्पक्ष नहीं है।

एनजीओ और शोध संस्थान जो आंकड़े पेश करते हैं वे नीति निर्माता और न्यायालय दोनों के ध्यान का केंद्र बन जाते हैं। पर कई बार ये आंकड़े चुनिंदा संदर्भों पर आधारित होते हैं। लोग सवाल उठाते हैं कि अगर सच्चे अर्थ में वायु गुणवत्ता सुधरनी है तो फैक्ट्रियों, वाहनों और पराली जलाने जैसे स्थायी स्रोतों पर भी उसी तरह की कार्रवाई क्यों नहीं की जाती। कुछ समुदायों में यह धारणा बन जाती है कि केवल समय-सीमित परंपरागत गतिविधियों पर ही फोकस करना तर्कसंगत नहीं है।

न्यायालयों का उद्देश्य सार्वजनिक स्वास्थ्य की रक्षा करना है और वह महत्वपूर्ण है। पर सिस्टम पर उठता सवाल यह है कि क्या कार्रवाई समग्र और संतुलित है। अगर कोर्ट किसी भी निर्णय में रहती है तो उसे यह भी देखना होगा कि उसके आदेश सामाजिक मनोदशा पर क्या असर डालते हैं। किसी भी समुदाय की परंपराएँ भावनात्मक और सांस्कृतिक लेंस से जुड़ी होती हैं और अचानक प्रतिबंध सामाजिक असंतोष का कारण बन सकते हैं।

परंपरा और सार्वजनिक स्वास्थ्य के बीच वह टकराव कहीं भी सरल नहीं है। दिवाली की परंपरा में पटाखे एक राजसी हिस्से की तरह हैं - बच्चों की उमंग, मोहल्ले का साथ और रात की चहल-पहल। दूसरी तरफ वैज्ञानिक और चिकित्सक कहते हैं कि वायु गुणवत्ता में गिरावट घातक स्वास्थ्य परिणाम ला सकती है। इसलिए नीतियाँ बनाते समय दोनों पहलुओं को ध्यान में रखना जरूरी है। केवल प्रतिबंध लगाना या केवल अनुमतियाँ देना, दोनों ही एकतरफा हो सकते हैं।

भरोसा इसी बहस का मुख्य विषय बन जाता है। जब लोग महसूस करते हैं कि आँकड़े selective हैं या नीति में पारदर्शिता नहीं है तो प्रतिक्रिया तीखी हो जाती है। समाधान पारदर्शिता और समग्र डेटा पर निर्भर करता है। यदि अध्ययन खुले और ऑडिटेबल होंगे, और न्यायालय समग्र प्रदूषण पोर्ट्रेट देखने के बाद निर्णय लेंगे तो समाज में भरोसा बढ़ेगा।

विकल्प मौजूद हैं। कई शहरों ने सीमित अवधि में नियंत्रित आतिशबाज़ी और सार्वजनिक प्रदर्शन की व्यवस्था की है। कुछ स्थानों पर ग्रीन क्रैकर्स को बढ़ावा दिया गया है। कुछ शहरों ने enforcement के साथ awareness campaigns भी चलाये। पर असली फर्क तब आएगा जब नीति प्रदूषण के अन्य स्रोतों पर भी प्रभावी होगी - औद्योगिक निगरानी, मोटर वाहन उत्सर्जन मानक, और पराली जलाने पर सख्त कदम। तब ही त्योहार के कुछ घंटों को जिम्मेदार तरीके से मनाया जा सकेगा।

नतीजा: प्रदूषण का मुकाबला जरूरी है पर इसका बोझ केवल त्योहारों पर डालना न्यायसंगत नहीं। नीति निर्धारक, न्यायपालिका और नागरिकों को मिलकर पारदर्शी और समान नीतियाँ बनानी होंगी ताकि परंपरा बनी रहे और हवा भी पीने योग्य रहे।

समाज में बढ़ती नाराजगी को अनदेखा करना ठीक नहीं। सार्वजनिक संवाद जरूरी है। NGOs, वैज्ञानिक समुदाय, और स्थानीय परंपरागत समूह मिलकर संवाद करें। यदि समाधान संवाद पर आधारित होंगे तो विभाजन कम होगा और ठोस कदम निकलेंगे।

यह मामला केवल कानून या पर्यावरण का नहीं है, यह भरोसे और सम्मान का है। दीवाली की रौशनी और साफ हवा दोनों का अधिकार है। नीति अगर दोनों को साथ लेकर चलती है तो जश्न और स्वास्थ्य दोनों सुरक्षित रहेंगे।

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