February 4, 2026
RSS 100 साल - इतिहास, शाखाएँ, उपलब्धियाँ और विवाद | Desi Radar
RSS 100 वर्ष समारोह - featured image

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने शताब्दी वर्ष पूरा कर लिया है। इस लेख में हम विस्तार से पढ़ेंगे कि RSS क्या है, उसकी शाखाएँ और उपविंग्स कैसे काम करते हैं, संगठन के सामाजिक कार्य और उपलब्धियाँ क्या रहीं, किन विवादों ने उसे घेरा, इंदिरा गांधी और राहुल गांधी जैसे नेताओं की सोच क्या रही, शताब्दी पर जारी स्मारक सिक्का व डाक टिकट की जानकारी और आगे की चुनौतियाँ क्या हैं। यह एक तथ्यात्मक और विश्लेषणात्मक लेख है जिसमें सार्वजनिक स्रोत और मीडिया कवरेज पर आधारित जानकारियाँ शामिल हैं।

इतिहास - RSS का जन्म, उद्देश्य और प्रारम्भिक दौर

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की स्थापना 27 सितंबर 1925 को नागपुर में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने की थी। प्रारम्भ में संगठन का औपचारिक उद्देश्य था हिंदू समाज में अनुशासन, राष्ट्रीय चेतना और सामाजिक समन्वय लाना। हेडगेवार उस समय की सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों से चिंतित थे और उन्हें लगा कि एक organized सामाजिक पुनर्निर्माण की जरूरत है, इसलिए उन्होंने शाखाओं का प्रणालीगत मॉडल अपनाया जहाँ स्वयंसेवक शारीरिक प्रशिक्षण, सांस्कृतिक शिक्षण और सामुदायिक सेवा में संलग्न होते।

1920-30 के दशक में RSS के स्वरूप में निरंतर विस्तार हुआ। संगठन ने धीरे-धीरे ग्रामीण और शहरी इलाकों में शाखाएँ खोलीं और स्वयंसेवकों का नेटवर्क बनता गया। स्वतंत्रता आंदोलन के समय और स्वतंत्रता के बाद RSS ने अपनी पहचान सांस्कृतिक व सामाजिक संगठन के रूप में बनाये रखने की कोशिश की, कभी-कभी राजनीतिक दबाव और आलोचना का सामना करते हुए। 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद RSS पर आरोप लगे और उसे अस्थायी रूप से प्रतिबंधित भी किया गया, पर बाद में यह प्रतिबंध हट गया और संगठन ने अपने संरचनात्मक ढांचे को और मजबूत किया।

समय के साथ RSS का दायरा बढ़ा और Sangh Parivar नामक साझा नेटवर्क उभरा जिसमें अलग-अलग समाजिक, छात्र, श्रमिक और धार्मिक संगठन जुड़े। RSS का मूल दर्शन हिंदू संस्कृति के पुनरुद्धार और राष्ट्रवादी चेतना पर टिका है। संगठन का दावा रहा कि वह सर्वसमावेशी राष्ट्रवाद चाहता है, पर आलोचक अक्सर इसके विचारों और गतिविधियों को सांप्रदायिक और राजनीतिक प्रभाव के रूप में देखते रहे हैं।

शाखाएँ और उपविंग्स - Sangh Parivar की संरचना

RSS की सबसे छोटी इकाई शाखा (Shakha) है। शाखाएँ स्थानीय स्तर पर चलती हैं जहाँ स्वयंसेवक नियमित रूप से मिलते हैं, व्यायाम करते हैं, और सांस्कृतिक विचारों पर चर्चा करते हैं और सामुदायिक कार्यों की योजना बनाते हैं। शाखाओं का संचालन स्थानीय कार्यकर्ताओं द्वारा होता है और वे सामाजिक जुड़ाव तथा अनुशासन को बढ़ाने का प्राथमिक मंच हैं।

Sangh Parivar में RSS के साथ कई समकक्ष और संबद्ध संगठन हैं जो अलग-अलग क्षेत्रों में सक्रिय हैं। प्रमुख विंग्स में शामिल हैं - Bharatiya Janata Party (BJP), Vishva Hindu Parishad (VHP), Akhil Bharatiya Vidyarthi Parishad (ABVP), Bharatiya Mazdoor Sangh (BMS), Bharatiya Kisan Sangh (BKS), Vidya Bharati (शैक्षणिक नेटवर्क), Seva Bharati, Rashtra Sevika Samiti (महिला विंग) और Vanavasi Kalyan Ashram।

हर विंग का अपना कार्यक्षेत्र है: ABVP छात्र संगठन के रूप में विश्वविद्यालयों व कॉलेजों में सक्रिय है; BMS मजदूर मुद्दों पर प्रतिक्रिया देता है; Vidya Bharati हजारों विद्यालयों के माध्यम से शिक्षा देता है जिनमें पाठ्यक्रम में संस्कार और संस्कृतिक विषयों का समावेश होता है; Seva Bharati आपदा राहत व समाजसेवा का महत्वपूर्ण काम करती है। इन उपविंग्स का एक सामान्य लक्ष्य संघ की विचारधारा का प्रसार और नेटवर्क का विस्तार करना है।

RSS शाखा का कार्यक्रम - स्थानीय प्रशिक्षण और सेवा

सामाजिक कार्य और उपलब्धियाँ - Relief से शिक्षा तक

RSS और उसके संचालित संगठनों ने कई सामाजिक कार्यों में भाग लिया है। प्राकृतिक आपदाओं के समय, जैसे भूकंप, बाढ़ और महामारी के दौरान Seva Bharati और अन्य स्वयंसेवक राहत तथा पुनर्वास कार्यों में सक्रिय रहे हैं। वे राहत शिविर चलाते हैं, भोजन और प्राथमिक चिकित्सा प्रदान करते हैं और पुनर्वास के लिए स्थानीय कामकाजी योजनाओं में सहयोग करते हैं। ऐसे कार्यों ने संगठन की लोक-स्तरीय उपस्थिति को मजबूत किया है।

Vidya Bharati के माध्यम से RSS का प्रभाव शिक्षा के क्षेत्र में दिखता है। Vidya Bharati स्कूलों का नेटवर्क लाखों बच्चों तक पहुंचता है और वहां पर सामुदायिक मूल्य, भारतीय संस्कृति और विषय-आधारित शिक्षा दी जाती है। किसानों और मजदूरों के लिए Sangh Parivar के BKS और BMS जैसी संस्थाएँ नीतिगत और स्थानीय मुद्दों पर संगठनात्मक स्वर देती हैं और वे विभिन्न आंदोलनों में भूमिका निभाती रही हैं।

इनके अलावा RSS ने शहरी व ग्रामीण विकास परियोजनाओं में स्वयंसेवकों के माध्यम से स्वच्छता अभियानों, स्वास्थ्य शिविरों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के जरिये सामुदायिक जुड़ाव बढ़ाया है। संगठन का दावा है कि इन पहलों का उद्देश्य समाज में सुधार और राष्ट्र निर्माण है। समर्थक इन उपलब्धियों को सामूहिक सेवा और संगठित कार्य के सकारात्मक उदाहरण मानते हैं।

उपलब्धियाँ - नेटवर्क निर्माण और संस्थागत प्रभाव

RSS की सबसे बड़ी उपलब्धियों में एक है उसका व्यापक नेटवर्क बनाना। दसियों हज़ार शाखाओं और लाखों स्वयंसेवकों के जरिये RSS ने ग्रामीण और शहरी इलाकों तक अपनी पहुँच बनाई है। यह नेटवर्क सामाजिक कार्यों में तेजी से manpower उपलब्ध कराता है और चुनावी समय में भी संगठनात्मक सहायता देता है।

Vidya Bharati स्कूलों का विस्तार और शिक्षा के क्षेत्र में स्थायी संस्थाएँ बनाना भी RSS के बड़े कामों में से एक है। सार्वजनिक स्वास्थ्य और relief operations में Seva Bharati व अन्य निकायों के योगदान को भी सकारात्मक रूप में देखा जाता है। संगठन ने स्थानीय स्तर पर leadership grooming और civic engagement को बढ़ावा दिया है, जिससे कई लोगों में community service का भाव मजबूत हुआ है।

इन्हीं कारणों से RSS समर्थक इसे एक राष्ट्र-निर्माण संस्था मानते हैं जिसने अनेक लोकहित कार्यों में tangible योगदान दिया है। सार्वजनिक क्षेत्र के कुछ हस्तक्षेपों और स्थानीय projects में RSS से जुड़े volunteers का योगदान दिखता है, जो उसे grassroot credibility भी देते हैं।

विवाद और आलोचनाएँ - प्रतिबंध, सांप्रदायिक आरोप और आलोचक

RSS के शताब्दी वर्ष तक आते आते संगठन ने काफी विवाद और आलोचना भी सहनी है। 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद RSS पर आरोप लगे और उसे समयतः प्रतिबंध का सामना करना पड़ा। बाद में 1975 में आपातकाल और 1992 के बाबरी मस्जिद निर्मूलन के बाद भी संघ और उसके जुड़े कार्यकर्ताओं के खिलाफ तीखी आलोचना व जांच हुई। इन घटनाओं ने RSS की छवि पर स्थायी प्रश्न चिन्ह छोड़ा।

आलोचक कहते हैं कि RSS की विचारधारा हिंदुत्व पर आधारित है और वह भारतीय समाज में धार्मिक व सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा देती है। कुछ विद्वानों और सामाजिक समूहों ने आरोप लगाया कि संघ की गतिविधियाँ अल्पसंख्यकों के खिलाफ भाव पैदा करती हैं और यह सामाजिक सामंजस्य के लिए खतरनाक है। दूसरी ओर RSS और उसके समर्थक इन आरोपों का खंडन करते हैं और कहते हैं कि उनके द्वारा किये गए कार्य समाज सेवा और संस्कृति के प्रचार के उद्देश्य से हैं।

कुछ आलोचनाओं में संगठन की राजनीतिक निकटता भी प्रमुख है। आधिकारिक तौर पर RSS राजनीति न करने का दावा करता है, पर Sangh Parivar के माध्यम से उसकी विचारधारा कई बार राजनीतिक दलों, विशेषकर BJP के साथ जुड़ी हुई दिखाई देती है। इस जुड़ाव ने अनुशंसकों के साथ-साथ विरोधियों में भी संदेह पैदा किया है कि संघ का प्रभाव भारतीय राजनीति पर किस हद तक है।

इंदिरा गांधी और संघ - टकराव का इतिहास

इंदिरा गांधी के शासनकाल और खासकर 1975-77 के आपातकाल के दौर में RSS और केंद्र सरकार के बीच तनाव चरम पर था। आपातकाल के दौरान संघ पर प्रतिबंध और दमनकारी कदम उठाए गए थे। इंदिरा गांधी का मानना था कि RSS जैसे संगठन विपक्षी और सामाजिक अस्थिरता के कारक बन सकते हैं, इसलिए उन्होंने कठोर कदम उठाए। यह समय संघ और कांग्रेस के बीच गहरी दूरियों का प्रतीक बन गया।

आपातकाल के बाद राजनीतिक समीकरण बदलते रहे और संघ का प्रभाव धीरे-धीरे अलग स्वरूप में उभरा। इंदिरा गांधी के दौर के निर्णय और संघ के खिलाफ कड़े रुख ने दोनों पक्षों की उस समय की राजनीतिक वास्तविकताओं को दर्शाया। इस टकराव के परिणाम आज भी राजनीतिक स्मृति में मौजूद हैं और संघ-राजनीति संबंधों के बारे में बहस का एक बड़ा इतिहास बनाते हैं।

राहुल गांधी की राय और समकालीन आलोचना

समकालीन विपक्ष और खासकर राहुल गांधी ने कई अवसरों पर RSS की नीतियों और राजनीतिक असर पर तीखी टिप्पणियाँ की हैं। राहुल गांधी की केंद्रीय दलील यह रही है कि RSS केवल सांस्कृतिक संगठन नहीं है बल्कि उसकी विचारधारा और संगठित नेटवर्क का राजनीतिक परिणाम भी है। वे बार-बार कहते रहे हैं कि संघ की सक्रियता और Sangh Parivar का असर लोकतांत्रिक संस्थाओं और बहुलतावादी मूल्यों पर प्रश्न खड़ा करती है।

राहुल गांधी के आरोपों में अक्सर यह तर्क मिलता है कि संघ की गतिविधियाँ राजनीतिक स्वरूप ले लेती हैं और समाज में विभाजन पैदा कर सकती हैं। दूसरी ओर संघ और उसके समर्थक इन आरोपों को राजनीति से प्रेरित और पक्षपाती बताते हैं। इस बहस के बीच संघ की साख और विपक्ष की आलोचना दोनों ही सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बनते हैं।

शताब्दी समारोह - स्मारक सिक्का और डाक टिकट का महत्व

RSS के 100 साल पूर्ण होने पर सरकार और संघ के बीच समन्वय में स्मारक सिक्का और डाक टिकट जारी किए गए। इस तरह के प्रतीकात्मक कदम अक्सर राष्ट्रभक्ति और सार्वजनिक स्वीकार्यता का संकेत होते हैं। स्मारक सिक्का पर जो छवियाँ अंकित की गईं, वे आयोजन के स्वर और संदेश का प्रतिनिधित्व करती हैं। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स और तस्वीरों में दिखा कि सिक्के पर भारत माता का चित्र और संघ के प्रतीकात्मक संकेत मुद्रित किए गए।

ऐसे सांकेतिक कदमों का राजनीतिक और सामाजिक मूल्य अलग-अलग दृष्टिकोण से तौला जाता है। समर्थक इसे संघ की सेवा और योगदान का राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता देना बताते हैं, जबकि आलोचक इसे संस्थागत समर्थन के रूप में देखते हैं जो विवादास्पद भी माना जा सकता है। किसी भी स्थिति में, स्मारक सिक्का और डाक टिकट ने संघ की शताब्दी को सार्वजनिक विमर्श का केंद्र बना दिया और मीडिया कवरेज ने इसे और व्यापक बनाया।

आधुनिक चुनौतियाँ और भविष्य की राह

RSS के सामने आज की दुनिया में कई चुनौतियाँ हैं। एक तो समाज में बढ़ती विविधता और बहुलतावादी अपेक्षाएँ, जो यह मांग करती हैं कि संस्थाएँ समावेशी नजरिए अपनाएँ। सोशल मीडिया की उपलब्धता ने संघ सहित सभी संगठनों के काम और बयानबाजी पर तेज विचार विमर्श और आलोचना ला दी है। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानदण्ड और India's global image भी संस्थाओं के काम को प्रभावित करते हैं।

RSS के लिए भविष्य की राह में लचीलापन और संवाद क्षमता महत्वपूर्ण होगी। यदि संगठन विविध समाज के साथ भरोसा बनाकर काम करने की रणनीतियाँ अपनाए, छोटे समुदायों के मुद्दों को खुले रूप से समझे और लोकतांत्रिक संस्थाओं के साथ संवाद को प्राथमिकता दे, तो उसकी सामूहिक वैधता बढ़ सकती है। वरना विवाद और आलोचना समय के साथ और तीव्र हो सकती है।

निष्कर्ष

RSS ने 100 साल का लंबा सफर तय किया है। इसके योगदानों में सामाजिक सेवा, relief work और नेटवर्क बनाना शामिल हैं। वहीं विवाद और आलोचनाएँ भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं: संघ के राजनीतिक प्रभाव, साम्प्रदायिक आरोप और समय-समय पर लगे प्रतिबंधों की याद। इंदिरा गांधी के दौर के टकराव से लेकर आज के राहुल गांधी के आरोपों तक, संघ का इतिहास बहुआयामी रहा है।

शताब्दी के इस पड़ाव पर प्रश्न यथावत् बनता है - RSS अपनी पहचान किस तरह रखेगा; क्या वह अपने सामाजिक कार्यों के साथ लोकतांत्रिक बहुलतावाद और अल्पसंख्यक सुरक्षा के मुद्दों पर खुलकर संवाद करेगा; और क्या संघ का अगला सौ साल अधिक समावेशी और कम विवादास्पद होगा? इन सवालों के जवाब समय और संगठन के निर्णयों से ही मिलेंगे।

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