क्यों हर भारतीय स्टार्टअप अमेरिकी बोलने की कोशिश करता है
भारत की नई पीढ़ी के स्टार्टअप्स का एक खास फैशन बन गया है - अंग्रेज़ी के कॉर्नर में बिकने वाली वही पुरानी Americanisms. कोई भी नया प्रोडक्ट हो, किसी की भी समस्या हल कर रहा हो - उसके pitch deck में वह जरूर लिखा मिलेगा कि यह "AI-driven, hyperlocal, community-first solution" है. सवाल यह है - क्या यह accent है या aspiration?
1 - यह accent नहीं, aspiration का खेल है
स्टार्टअपिंग अब सिर्फ़ प्रोडक्ट बनाना नहीं रहा, यह एक cultural audition बन गया है. निवेशक और ग्लोबल मीडिया जिस भाषा में आराम से सुनते हैं, वही भाषा अपनाई जाती है. इसलिए founders वह शब्द बोलते हैं जो investors के कान तक जल्दी पहुँचें. वे नहीं सोचते कि ग्राहक क्या सुनना चाहता है - वे सोचते कि investor क्या सुनना चाहता है.
2 - फंडिंग का सर्टिफिकेट
VC की दुनिया में presentation का पहला नियम है - sound credible. और credibility का तात्पर्य अब अक्सर global-sounding vocabulary से होता है. अगर pitch deck में "market fit" और "unit economics" की jargon नहीं है, तो meeting के बाद follow-up कम आता है. असल में यही वजह है कि हर दूसरी पिच में Silicon Valley की भाषा नज़र आती है.
3 - ब्रांडिंग की ज़रूरत - local product, global voice
कई उत्पाद साफ़-साफ़ देसी समस्याओं को हल करते हैं - दूध की सप्लाई, किसान क्रेडिट, लोकल लॉजिस्टिक्स. पर branding global दिखनी चाहिए ताकि expansion के सपने आसानी से बिक सकें. इसलिए नाम भी international-style रखा जाता है - "KhetiX" या "UrbanHive" - ताकि खाता खोलो तो लगे जैसे company ने पहले ही Series A cross कर लिया हो.
4 - सोशल मीडिया का दबाव
LinkedIn और Twitter पर founders दिखना चाहते हैं. वहां जो viral होता है, वह अक्सर अंग्रेज़ी में hot लगता है. इसलिए personal branding का हिस्सा बन गया है American tone adopt करना - interviews, podcasts और thought pieces में वही भाषा चलती है. यह दिखावे का हिस्सा बन गया है, पर असर असली decision-makers पर पड़ता है.
जब validation चाहिए तो आवाज़ बदलनी पड़ती है - product वही, packaging अलग.
5 - perception gap और reality
Indian consumer अक्सर simple चीज़ चाहता है - काम करे, भरोसा दे, सस्ता हो. पर founders और investors की बातों में यह गायब रह जाती है. अधिकतर टीमें अपने users से ज़्यादा investors को impress करने की कोशिश करती हैं. अंत में product localization और customer support की बातें पिछड़ जाती हैं.
6 - क्या फर्क पड़ता है?
अल्कोहल-भरे buzzwords से असली काम नहीं होता. कोई भी consumer उस भाषा से प्रभावित नहीं होता जब तक product value न दे. पर ecosystem में जो पैसे और अवसर वहीं चलते हैं, वे अक्सर उन projects की तरफ जाते हैं जो अच्छा "global pitch" करते हैं. यानी - दिखने से फायदा मिलता है, पर टिकने से नहीं.
7 - कुछ स्टार्टअप्स ने रास्ता बदला है
अच्छी खबर यह है कि कुछ कंपनियाँ वापस जमीन पर आ रही हैं. वे अपनी भाषा वापस कर रही हैं - स्थानीय भाषा, सादगी और सीधा संदेश. ये लोग जानते हैं कि retention और unit economics ultimate metric हैं, न कि fancy slide. धीरे-धीरे investors भी local traction को महत्व दे रहे हैं.
8 - सलाह - बोलो सच्ची भाषा, पर समझो श्रोता
अगर तुम्हारा ग्राहक दिल्ली का कॉलेज छात्र है तो उसे अंग्रेज़ी और memes पसंद आएँगे. पर अगर ग्राहक गोरखपुर का kirana store है तो वही भाषा नहीं चलेगी. बड़े founders की समझ यह होनी चाहिए - pitch investor के लिए और product user के लिए. दोनों को confuse मत करो.
निष्कर्ष
हर भारतीय स्टार्टअप अमेरिकी बोलने की कोशिश इसीलिए करता है क्योंकि वही भाषा वर्तमान में validation, funding और visibility दिलाती है. पर यह केवल packaging है. असली जीत तब आती है जब product local pain solve करे और business model sustainable हो. तब तुम्हारी बोली भी स्वतः विश्वसनीय दिखेगी - भले tone कितना भी देसी या विदेशी हो.