January 31, 2026
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क्यों रिटायर्ड सशस्त्र बल के अफसर पॉडकास्ट कर रहे हैं
प्रकाशित: 10 अक्टूबर 2025 · लेखक: Desi Radar रिपोर्टिंग टीम

अचानक कई रिटायर्ड सैन्य अधिकारी माइक्रोफोन लेकर पॉडकास्टिंग करने लगे हैं। यह नई आदत सिर्फ़ हाउस की चाय बदलने जैसा नहीं है - यह मीडिया, पहचान और सार्वजनिक नरेटिव पर असर डालने वाला कदम है। नीचे समझो कि क्यों यह ट्रेंड उभरा, किसका फायदा हो रहा है और इस बदलाव का लोकतंत्र पर क्या मतलब निकलता है।

1 - अब बोलने की आजादी और पब्लिक भूख

सेवा के दौरान अफसरों के लिए बोलने की शर्तें कठोर होती हैं। सेवानिवृत्ति के बाद वे अचानक सार्वजनिक चर्चा में अधिक खुलकर हिस्सा ले सकते हैं। जनता और मीडिया की ओर से insider perspective की भूख भी बड़ी है। जब सीमा, रणनीति या सुरक्षा की बात आती है तो लोग वही सुनना चाहते हैं जिनके पास जमीन का अनुभव हो। पॉडकास्ट लंबी चर्चा के लिए सबसे उपयुक्त प्लेटफॉर्म है।

2 - पहचान और रोज़गार का नया मैदान

रिटायरमेंट के बाद कई अफसरों को पहचान और rhythm गंवाने का अहसास होता है। पॉडकास्टिंग एक सस्ता, जल्दी शुरू होने वाला और प्रभावी तरीका है अपनी आवाज बनाए रखने का। कुछ इसे अपना व्यक्तिगत ब्रांड बनाने के रूप में देखते हैं; कुछ थिंक टैंक्स, कॉर्पोरेट स्पीकिंग और मीडिया के साथ जुड़ने के रास्ते खोलते हैं। यह पैसा कमाने का जरिया भी बन सकता है, पर ज्यादातर मामलों में यह पहचान वापस पाने की कोशिश है।

3 - मीडिया पर भरोसे की समस्या

जैसा कि तुमने नोट किया, पारंपरिक मीडिया पर भरोसा घटा है और टीवी पैनेलों की चिल्लाहट किसी के अनुभव को नकल-सा बना देती है। अफसर टीवी के शोर में अपना संदेश खोना नहीं चाहते। पॉडकास्ट में वे लंबी, context-rich बातचीत कर पाते हैं जमीनी उदाहरण, तकनीकी स्पष्टीकरण और व्यक्तिगत अनुभव। यह सहजता उन्हें credibility भी देती है।

पॉडकास्ट उस जगह की तरह है जहाँ बिना तड़क-भड़क के, मुद्दे की गहराई में जाया जा सकता है।

4 - डिजिटल नरेटिव और कंट्रोल का सवाल

कितनी भी अच्छी नियत क्यों न हो, सार्वजनिक मंच पर जो बोलेगा वही narrative बनता है। रिटायर्ड अफसर खुद कहने लगते हैं ताकि उनकी बात किसी और के एजेंडा में न फंस जाए। खासकर जब सुरक्षा, हथियार या विदेश नीति पर बयान मीडिया में sensationalized होते हैं, तो इन अफसरों का उद्देश्य सटीकता और context देना होता है। कभी-कभी यह influenceिंग भी बन जाता है — खासकर तब जब दर्शक बड़ी संख्या में हों।

5 - युवा ऑडियंस और फॉर्मैट का मेल

पॉडकास्ट का ऑडियंस युवा और विचारशील वर्ग है जो लंबी बातचीत पसंद करता है। वह पीढ़ी जो कमेंट्री और explainers सुनना चाहती है, वही अफसरों की बातों पर ध्यान देती है। यह mismatch नहीं है, यह synergy है — अनुभव और curiosity मिलते हैं।

6 - नीतिगत असर और अकादमिक इंटरेस्ट

पॉडकास्ट सिर्फ़ ऑडियंस के लिए नहीं होते; नीति निर्माताओं, शोधकर्ताओं और पत्रकारों के लिए भी यह सामग्री उपयोगी होती है। कई पॉडकास्ट बाद में policy briefs, interviews और debates का स्रोत बन जाते हैं। यह अफसरों को विद्वत्ता और नीति संवाद में सीधे प्रभाव देने का जरिया देता है।

7 - जोखिम - राजनीतिकरण और bias

सब अच्छा नहीं है। जब अफसर सार्वजनिक बहस में आते हैं, तो उनका भाषा, चयन और कॉन्टेक्स्ट राजनीतिक हो सकता है। कभी-कभी पॉडकास्ट subtle तरीक़े से किसी narrative को endorse कर देते हैं। इसलिए सुनने वाले को यह देखना होगा कि वक्ता transparency रख रहे हैं या hidden affiliations हैं। रिपुटेशन और neutrality की गारंटी नहीं होती।

8 - क्या यह लोकतंत्र के लिए अच्छी बात है?

मिश्रित आंकड़ा है। सकारात्मक पहलू यह है कि अनुभवजन्य और तकनीकी बातें जनता तक पहुंच रही हैं, जो सार्वजनिक चर्चा को informed बनाती है। नकारात्मक पहलू यह है कि अगर वही आवाज़ें single perspective पर टिक जाएँ या commercialization कर दें तो debate fragmented और biased हो सकती है। असली लाभ तब होगा जब diverse voices platform पर उपलब्ध रहें - सैनिक, नागरिक, शोधकर्ता और पत्रकार - सब मिलकर बहस चलाएँ।

निष्कर्ष

रिटायर्ड अफसरों का पॉडकास्टिंग में आना एक समयाइत ट्रेंड है जिसका अर्थ नेता बनने या मीडिया-कांग्रेस तक सीमित नहीं है। यह पहचान, narrative-control और ऑडियंस की मांग का मिलाजुला परिणाम है। यदि ये बातचीत पारदर्शी, संदर्भित और संतुलित रहे तो यह जनता और नीति दोनों को बेहतर बनाएगा। वरना यह केवल नया मंच होगा जहाँ पुराने पेंडिंग एजेंडों को बढ़ावा मिलेगा।

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