भारत की नई पीढ़ी Gen Z धीरे-धीरे पारंपरिक न्यूज दुनिया से पीछे हट रही है। अब वे अखबार या टीवी चैनल पर नहीं टिकते। उन्हें खबरें चाहिए लेकिन शोर नहीं। वे Reels, Podcasts और भरोसेमंद छोटे स्रोतों से जानकारी लेते हैं। यह बदलाव केवल डिजिटल नहीं है, यह सोच का भी बदलाव है।
हर चीज़ ब्रेकिंग है पर सच्चाई नहीं
हर चैनल हर मिनट Breaking News दिखाता है। लेकिन Gen Z जानती है कि हर ब्रेकिंग खबर ज़रूरी नहीं होती। खबरें अब जानकारी नहीं, उत्तेजना बेच रही हैं। इसीलिए युवाओं ने न्यूज चैनलों को म्यूट कर दिया है और शांत स्रोत ढूंढ लिए हैं।
भरोसा अब दुर्लभ है
जब हर चैनल एक ही घटना को अलग कहानी बनाकर दिखाए तो भरोसा टूटता है। Gen Z ने सीखा है कि सच्चाई आवाज़ की ऊंचाई से नहीं, डेटा और फैक्ट से तय होती है। यही कारण है कि वे अब स्वतंत्र यूट्यूबर्स, पॉडकास्ट होस्ट और डेटा आधारित मीडिया को ज्यादा भरोसेमंद मानते हैं।
मानसिक शांति जरूरी है
हर दिन हिंसा, विवाद और राजनीति की नकारात्मकता में जीना आसान नहीं। Gen Z अपनी मेंटल हेल्थ के लिए मीडिया डिटॉक्स करती है। वे मानते हैं कि सूचित रहना जरूरी है लेकिन परेशान रहना नहीं। अब वे वही खबरें पढ़ते हैं जो संतुलित हों और समाधान दिखाएं।
Algorithm ही नया एडिटर
Gen Z का न्यूज अनुभव पूरी तरह algorithm पर टिका है। वे जो देखते हैं वही algorithm दोबारा दिखाता है। एक मिनट की रील में दुनिया का सार, तीन मिनट की वीडियो में नीति की व्याख्या और पांच सेकंड के मीम में व्यंग्य। यही नया न्यूज फॉर्मैट है।
भाषा का फर्क
टीवी की औपचारिक हिंदी अब उन्हें अप्रासंगिक लगती है। वे वही भाषा पसंद करते हैं जो सरल, मज़ेदार और सीधी हो। नई पत्रकारिता के लिए जरूरी है कि वह दर्शक की भाषा बोले, न कि मंच की।
Gen Z खबरों से नहीं भाग रही, वे सिर्फ उस मंच से हट गई हैं जो उन्हें सुनता नहीं।
सूचना के नए ठिकाने
अब खबरें पॉडकास्ट, यूट्यूब और ट्विटर/X पर मिलती हैं। Gen Z लंबे व्याख्यात्मक फॉर्मैट पसंद करती है जहाँ गहराई मिले। उनके लिए न्यूज़ का मतलब अब shouting match नहीं बल्कि perspective है।
Reels, Memes और Podcasts नया न्यूज़ कल्चर
नई पीढ़ी को जानकारी चाहिए लेकिन उबाऊ अंदाज़ में नहीं। इसलिए Finshots, Soch by Mohak Mangal या Abhi & Niyu जैसे creators उनके लिए journalist बन चुके हैं। अब न्यूज रिपोर्टिंग और कंटेंट क्रिएशन के बीच की दीवार लगभग खत्म हो गई है।
सच की तलाश जारी है
Gen Z को दिखावे से दिक्कत है। उन्हें वही पत्रकार पसंद हैं जो डेटा और तर्क के साथ बोलते हैं। वे जान चुके हैं कि सच्चाई को चीखने की जरूरत नहीं होती। इसलिए वे उस ओर मुड़ रहे हैं जहाँ संवाद हो, प्रचार नहीं।
निचोड़
Gen Z ने पारंपरिक मीडिया से दूरी बनाई है लेकिन खबरों से नहीं। उन्होंने अपनी सूचना यात्रा को नए फॉर्मैट्स और भरोसेमंद आवाज़ों में ढाला है। भविष्य में पारंपरिक चैनलों को नहीं, content creators को ज्यादा भरोसा मिलेगा। क्योंकि नई पीढ़ी समझ चुकी है कि सच धीरे बोला जाए तो भी असरदार होता है।