

लद्दाख, जो कभी शांत और खूबसूरत पहाड़ी भूमि के लिए जाना जाता था, कल अचानक सुर्खियों में छा गया। चार लोगों की मौत और दर्जनों घायल, पूरे लेह में कर्फ्यू — ये हालात एक स्थानीय आंदोलन से बढ़कर अब राष्ट्रीय और राजनीतिक बहस का हिस्सा बन गए हैं।
लेकिन सवाल उठता है: जब लद्दाख जम्मू-कश्मीर का हिस्सा था, तब ऐसी हिंसक घटनाएँ क्यों नहीं हुईं? और अब, जब इसे कश्मीर से भी बड़ा केंद्रशासित प्रदेश बनाया गया है, अचानक यह अस्थिरता क्यों बढ़ गई?

1947 से 2019 तक लद्दाख जम्मू-कश्मीर राज्य का हिस्सा रहा। उस समय भी राजनीतिक असंतोष ज़रूर था, लेकिन हिंसा या दंगे की कोई बड़ी घटना नहीं हुई। लोग मानते थे कि उनकी आवाज़ विधानसभा और राज्य की राजनीति के जरिए कम-से-कम कुछ सुनी जाती थी।
लेकिन 2019 में बड़ा बदलाव आया:
- अनुच्छेद 370 हटाया गया और जम्मू-कश्मीर को दो हिस्सों में बांटा गया।
- लद्दाख अब एक स्वतंत्र केंद्रशासित प्रदेश बन गया, बिना विधानसभा के।
- शुरुआत में लोगों ने सोचा कि यह बदलाव विकास और केंद्र से सीधे नियंत्रण लाएगा, लेकिन समय के साथ राजनीतिक प्रतिनिधित्व और स्थानीय अधिकारों की कमी ने जनता को असुरक्षित महसूस कराया।
हिंसा के पीछे की वजहें
- राजनीतिक प्रतिनिधित्व की कमी
- लेह और कारगिल को सीधे केंद्रशासित अधिकारियों के जरिए चलाया जा रहा है।
- जनता को लगता है कि उनके पास स्थानीय निर्णय लेने की शक्ति नहीं है।
- सांस्कृतिक और पहचान का संकट
- लद्दाखी समाज अपनी भाषा, संस्कृति और जनजातीय पहचान को लेकर चिंतित है।
- “छठी अनुसूची” के तहत विशेष सुरक्षा की मांग इसी वजह से जोर पकड़ रही है।
- आर्थिक असंतोष
- संसाधनों पर स्थानीय नियंत्रण कम हो गया है।
- बाहरी निवेश और भूमि खरीद पर चिंता बढ़ गई है।
This man rioting in Ladakh is Phuntsog Stanzin Tsepag, Congress Councillor for Upper Leh Ward.
— Amit Malviya (@amitmalviya) September 24, 2025
He can be clearly seen instigating the mob and participating in violence that targeted the BJP office and the Hill Council.
Is this the kind of unrest Rahul Gandhi has been… pic.twitter.com/o2WHdcCIuC
हिंसा के दौरान कांग्रेस के पार्षद (Phuntsog Stanzin Tsepag) का नाम भी चर्चा में आया।
- भाजपा और प्रशासन का आरोप है कि पार्षद ने प्रदर्शनकारियों को उकसाने में भूमिका निभाई।
- पुलिस ने पार्षद के खिलाफ एफआईआर दर्ज की और कई लोगों को हिरासत में लिया।
- कांग्रेस ने आरोपों का खण्डन किया और कहा कि उनका हिंसा से कोई संबंध नहीं है।
- सोनम वांगचुक ने भी कहा कि कांग्रेस इतनी ताकत नहीं रखती कि हजारों युवाओं को अचानक उकसाकर यह स्थिति पैदा कर सके।
यह विवाद स्पष्ट करता है कि राजनीतिक दल और प्रशासन के बीच अविश्वास और आरोप-प्रत्यारोप की स्थिति बनी हुई है।
इस हिंसा के साथ कई षड्यंत्र सिद्धांत जुड़कर चर्चा में हैं:
- राजनीतिक चाल: विरोधी दल और स्थानीय गुट इसे केंद्र सरकार पर दबाव बनाने के लिए उकसाने का दावा कर रहे हैं।
- विदेशी हस्तक्षेप: चीन और पाकिस्तान की भूमिका पर भी संदेह जताया जा रहा है, क्योंकि लद्दाख सीमावर्ती क्षेत्र है।
- आंतरिक गुटबाज़ी: लेह और कारगिल के बीच पुराने मतभेदों को भड़काकर हालात बिगाड़े गए।
मीडिया और सोशल प्लेटफॉर्म पर यह सिद्धांत तेजी से वायरल हो रहे हैं, जिससे वास्तविक तथ्य और अफवाह के बीच अंतर करना मुश्किल हो गया है।
VERY SAD EVENTS IN LEH
— Sonam Wangchuk (@Wangchuk66) September 24, 2025
My message of peaceful path failed today. I appeal to youth to please stop this nonsense. This only damages our cause.#LadakhAnshan pic.twitter.com/CzTNHoUkoC
लद्दाख में हिंसा सिर्फ़ एक आंदोलन नहीं है, बल्कि राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक जटिलताओं का परिणाम है।
- जब लद्दाख जम्मू-कश्मीर का हिस्सा था, तो राजनीतिक मंच मौजूद था, जिसकी वजह से बड़े पैमाने की हिंसा नहीं हुई।
- अब, एक बड़ा क्षेत्र होने के बावजूद स्थानीय प्रतिनिधित्व की कमी, सांस्कृतिक असुरक्षा और आर्थिक असंतोष ने जनता को असंतोष की ओर धकेला।
- राजनीतिक आरोप, साज़िश सिद्धांत और कांग्रेस पार्षद का विवाद और घटनाओं को और जटिल बना रहा है।
भविष्य में स्थिरता तभी आएगी जब सरकार और स्थानीय समाज संवाद, संवैधानिक सुरक्षा और विकास को साथ लेकर चलें।