राज्य निर्माण के समय उत्तराखंडवासियों ने एक नया सपना देखा था। यह सपना था बेहतर शासन का, ईमानदार राजनीति का और पहाड़ों की अस्मिता को सम्मान देने का। लेकिन हाल के घटनाक्रम यह दिखाते हैं कि यह सपना चुनौती में है। राज्य की राजनीति आज कई लोगों की नजर में एक व्यक्ति के इर्द-गिर्द केंद्रित दिखती है और इससे जुड़ी घोटाले और विवाद जनता के विश्वास को झकझोर रहे हैं।
घोटालों और विवादों से घिरा माहौल
पिछले कुछ समय में राज्य ने कई संवेदनशील चर्चाओं का सामना किया है। इनमें प्रमुख हैं भर्ती परीक्षाओं में पेपर लीक के आरोप, इको-टूरिज्म और भूमि से जुड़ी परियोजनाओं पर उठे सवाल, और छात्रों तथा नागरिकों द्वारा किये गये विरोध प्रदर्शन। कुछ मामलों में अदालतों ने भी राज्य के निर्णयों पर प्रश्न उठाये हैं। इन घटनाओं ने व्यापक असंतोष और अविश्वास को जन्म दिया है।
केंद्रित नेतृत्व का भाव क्यों बन रहा है
तीन कारण इस धारणा को पुख्ता करते हैं कि शासन अब एक व्यक्ति के इर्द-गिर्द हो रहा है:
- निर्णयों का केंद्रीकरण: बड़े फैसलों में मुख्यमंत्री का व्यक्तित्व सबसे आगे दिखाई देता है और इससे प्रशासन का व्यक्तिगत नेतृत्व पर निर्भर होना प्रतीत होता है।
- परिवार और परिधीय लोगों पर फोकस: मीडिया में परिवार या करीबी सहयोगियों के नाम आने से संदेह बढ़ता है। यह आवश्यक नहीं कि सभी आरोप सिद्ध हों, पर लगातार रिपोर्टिंग प्रभाव डालती है।
- बार-बार उठने वाले विवाद: पेपर लीक, भूमि विवाद और परियोजना संबंधी अनियमितताओं जैसी घटनाओं की आवृत्ति से सिस्टम की विश्वसनीयता घटती है।
राज्य और जनता को होने वाला नुकसान
जब संस्थागत पारदर्शिता कमजोर होती है तब इसके उल्टे प्रभाव दूरगामी होते हैं। कुछ सीधे नुकसान इस प्रकार हैं:
- भरोसे में गिरावट: खासकर युवा वर्ग में, सार्वजनिक भर्ती प्रक्रियाओं पर भरोसा घटता है और इससे बेरोजगारी व असंतोष का भाव बढ़ता है।
- नीतिगत विफलता: जब निर्णय पारदर्शी नहीं होते तब परियोजनाओं का सही क्रियान्वयन मुश्किल हो जाता है।
- लोकतांत्रिक लागत: सत्तारूढ़ केंद्र में केंद्रीकरण से जवाबदेही घट सकती है और निजी हितों के लिए नीतियां अनुकूलित होने का खतरा बढ़ता है।
सबूत क्या दिखाते हैं और क्या नहीं
यह आवश्यक है कि हम तथ्यों और आरोपों के बीच फर्क समझें। सार्वजनिक दस्तावेज और मीडिया रिपोर्ट बताते हैं कि कुछ मामलों में जांच और कोर्ट की टिप्पणियां सामने आयी हैं। परन्तु किसी भी व्यक्ति के खिलाफ आरोप तभी निर्णायक माने जायें जब उन्हें कानूनी रूप से साबित किया गया हो। इस लिहाज से वर्तमान रिकॉर्ड बताता है कि समस्या वास्तविक है पर कई व्यक्तिगत आरोप अभी जांच के अधीन हैं।
नागरिकों और समाज के लिए सुझाव
अगर आप एक जागरूक नागरिक हैं और इस स्थिति से चिंतित हैं तो कुछ व्यवहारिक कदम हैं जिनसे पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ सकती है:
- जांच में पारदर्शिता की मांग: हाई-प्रोफाइल मामलों में न्यायिक निगरानी या स्वतंत्र पैनल की मांग करें ताकि प्रक्रिया पर भरोसा बन सके।
- आरटीआई का प्रयोग: भर्ती, जमीन और सार्वजनिक ठेकों से जुड़ी सूचनाओं के लिए आरटीआई आवेदन करें।
- स्वतंत्र मीडिया का समर्थन: जांची-पोछी पत्रकारिता का साथ दें और व्हिसलब्लोअर्स की सुरक्षा के लिए दबाव बनाएं।
- संस्थागत सुधार का समर्थन: भर्ती आयोग, पर्यावरण और खरीद एजेंसियों को ज्यादा स्वतंत्र और पारदर्शी बनाये जाने की मांग रखें।
- नागरिक पैनल: विशेषज्ञ नागरिक पैनल बनाकर बड़े परियोजनाओं पर समीक्षा रिपोर्ट सार्वजनिक की जा सकती है।
- कानूनी रास्तों का जिम्मेदार उपयोग: जनहित याचिकाओं का उपयोग करें पर अदालतों को राजनीतिक हथियार न बनाएं।
निष्कर्ष
उत्तराखंड का वह सपना जिसकी नीव पर राज्य बना, अभी भी अधूरा है पर मिटाया नहीं गया है। हाल के विवाद चेतावनी हैं और इन्हें सुधार का अवसर भी माना जा सकता है। राज्य को फिर से उस मार्ग पर लाने के लिए निर्णायक पारदर्शिता, संस्थागत सुधार और नागरिक दबाव की आवश्यकता है। अगर सत्ता में बैठे लोग स्वतंत्र निगरानी का स्वागत करेंगे और जवाबदेही बढ़ायेंगे तो यह परिवर्तन संभव है।